maharana pratap history and jayanti

Maharana Pratap history in hindi:- दोस्तो हम आपको महाराणा प्रताप के बारे सारी जानकारी देने वाले है आप इस पोस्ट को अंत तक पढ़ेगे तो महाराणा प्रताप के बारे में सबकुछ जान जायेगे मेवाड़ में बहुत सारे राजा हुए लेकिन उनको इतना नही जानते लोग आज भी लोगो के दिलो में बसते है महाराणा प्रताप दोस्तो महाराणा प्रताप ने मेवाड़ भूमि के लिए अपना सबकुछ दाव पर लगा दिया था

महाराणा प्रताप का इतिहास

अकबर भारत का महानतम विजेता व साम्राज्य निर्माता था। ऐसे सम्राट का विरोध एक अकेले छोटे से राज्य ने किया और वह था मेवाड़ मेवाड़ ने अकबर की साम, दाम, दंड और भेद सभी नीतियों को पैरों तले रौंद कर अपनी स्वाधीनता की रक्षा की।

maharana pratap jayanti - maharana pratap punyatithi - Maharana Pratap
मेवाड़ के तीन महाराणा उदयसिंह, प्रताप सिंह और अमरसिंह अकबर के समकालीन थे। तीनों को अकबर की 'शत्रुता' का सामना करना पड़ा। तीनों ने अपने गौरव और अपने राज्य की स्वाधीनता के लिए अकबर से संघर्ष किया और तीनों में से एक से भी अकबर अपनी अधीनता स्वीकार नहीं करा सका। महाराणा अमरसिंह ने अंतिम समय में जहाँगीर से संधि की परन्तु वह भी अपनी शर्तों पर ।
वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को (पाली) कुंभलगढ़ में महाराणा उदयसिंह की रानी जयवंता बाई (पाली में के सोनगरा अखेराज की पुत्री) की कोख से हुआ। महाराणा उदयसिंह ने अपनी दूसरी पत्नी जैसलमेर के भाटी राजवंश की पुत्री धीरबाई से उत्पन्न पुत्र जगमाल को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया जबकि प्रताप सबसे बड़े व योग्य पुत्र थे। महाराणा उदयसिंह का देहावसान 28 फरवरी, 1572 को हुआ। उदयसिंह की मृत्यु के बाद जगमाल को राजगद्दी पर भी बैठा दिया गया । लेकिन जालौर के अखयराज व ग्वालियर के रामसिंह ने इसका विरोध किया तथा प्रमुख सरदारों की सहमति से महाराणा उदयसिंह की उत्तर क्रिया से लौटकर गोगुंदा में महाराणा प्रताप को राज्य सिंहासन पर बिठाया गया। यह एक प्रकार से 'राजमहलों की क्रांति' थी क्योंकि पूर्व महाराणा के निर्णय को बदलकर गद्दी पर बैठे महाराणा को हटा दिया गया था। जगमाल रुष्ट होकर बादशाह अकबर के पास चला गया। जब प्रताप गद्दी पर बैठे तब उनकी आयु 32 वर्ष की हो चुकी थी। राणा प्रताप 'कीका' के नाम से लोकप्रिय थे। प्रताप का विधिवत् राज्याभिषेक समारोह कुम्भलगढ़ में मनाया गया। जोधपुर के राठौड़ राजा राव चन्द्रसेन भी इस समारोह में आये थे।

अकबर द्वारा प्रताप से समझौते के प्रयत्न

सम्राट अकबर की पहल पर 1572-1573 में महाराणा प्रताप से समझौते के चार प्रयत्न हुए। सम्राट का पहला प्रतिनिधि जलालखान कोरची था जिसे नवम्बर, 1572 में महाराणा प्रताप के पास भेजा गया। इसके बाद जून, 1573 में आमेर के कुँवर मानसिंह को भेजा गया। उसके बाद सितम्बर, 1573 में मानसिंह के पिता आमेर के राजा भगवन्तदास को तथा इसके बाद अंतिम प्रयत्न के रूप में राजा टोडरमल' को दिसम्बर 1573 में प्रताप से संधि हेतु भेजा गया। लेकिन ये सभी दूत महाराणा प्रताप को अकबर की अधीनता स्वीकार करने हेतु न मना सके

महाराणा प्रताप का हल्दीघाटी का युद्ध


सभी संधि के प्रयास असफल हो जाने पर अन्तत: मुगल बादशाह अकबर ने मानसिंह के नेतृत्व में शाही सेना को महाराणा प्रताप पर आक्रमण करने हेतु 3 अप्रैल, 1576 को अजमेर से रवाना किया। मानसिंह ने मांडलगढ़ में डेरा डाला। मानसिंह के जीवन की यह पहली लड़ाई थी जिसमें वह स्वयं सेनापति बने थे। 

मानसिंह के मांडलगढ़ पहुंचने का समाचार सुनकर महाराणा प्रताप सेना सहितं कुम्भलगढ़ से गोगुंदा आ गये। मानसिंह की सेना मांडलगढ़ से गोगुंदा की ओर बढ़ी। महाराणा प्रताप मेवाड़ की सेना के साथ गोगूंदा से रवाना हुए और खमनोर से 10 मील दक्षिण-पश्चिम में लोसिंग गाँव पहुँचे। हल्दीघाटी राजसमंद जिले में नाथद्वारा से 11 मील दक्षिण पश्चिम में गोगुन्दा और खमनोर के बीच एक संकरा स्थान है। यहाँ की मिट्टी के हल्दी के समान पीली होने के कारण इसका नाम हल्दीघाटी पड़ा।

महाराणा प्रताप व अकबर की सेनाओं के मध्य खमनोर गाँव के पास की समतल भूमि हल्दी घाटी के मैदान (रक्त तलाई) में 21 जून, 1576 (वि.स. 1633) को हल्दीघाटी का प्रसिद्ध युद्ध हुआ। (नोट: प्रसिद्ध इतिहासज्ञ श्री गोपीनाथ शर्मा की पुस्तक 'राजस्थान का इतिहास तथा राजस्थान सरकार के प्रकाशन 'Rajasthan Through the Ages' के Volume-2 में इस युद्ध की तिथि 21 जून, 1576 दी गई है।) इस युद्ध में महाराणा प्रताप के साथ में ग्वालियर के रामसिंह व उसके पुत्र, शालिवाहन आदि भामाशाह व उसका भाई ताराचन्द झाला मानसिंह झाला बीदा, सोनगरा मानसिंह आदि प्रमुख व्यक्ति थे। प्रताप की सेना के सबसे आगे के भाग का नेतृत्व हकीम खान सूर पठान के हाथ में था। मानसिंह की सेना की मुख्य अग्रिम पंक्ति का संचालन आसफ खान और जगन्नाथ कछवाहा कर रहे थे। इस युद्ध में शाही सेना के साथ प्रमुख तिहासकार अलबदायूँनी भी उपस्थित था।

हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप घायल हो गये थे। प्रताप युद्ध क्षेत्र छोड़ने को तैयार नहीं थे लेकिन झाला बीदा ने प्रताप का स्थान लिया और प्रताप के स्वामीभक्त सामन्त व सैनिक प्रताप को सुरक्षित स्थान तक ले गए।

जब प्रताप मैदान से जा रहे थे तो दो मुगल सैनिकों ने उनका पीछा किया। प्रताप का भाई शक्तिसिंह जो उस समय मुगल सेना में था, ने उन दोनों सैनिकों का पीछा किया और उन्हें मार डाला। दोनों भाई बलीचा गाँव के पास एक नाले के किनारे मिले। वहीं चेतक ने आखिरी साँस ली। वहीं चेतक का चबूतरा बना हुआ है।

राणा प्रताप के अचानक युद्ध भूमि से हट जाने के बाद मेवाड़ की सेना की हिम्मत टूट गई थी। झाला बीदा ने प्रताप का स्थान ले लिया। मुगल सैनिकों ने झाला बीदा को ही प्रताप समझा व उन्हें मार गिराया। अंततः मेवाड़ी सेना को मैदान छोड़ना पड़ा। युद्ध दोपहर को मुगलों की जीत के साथ समाप्त हो गया। कुँवर मानसिंह अगले ही दिन गोगुंदा चला गया। मुगलों का लक्ष्य प्रताप था वह न पकड़ा जा सका न मारा जा सका। प्रताप युद्ध के बाद कोल्यारी गाँव पहुंचे। अपना ईलाज करवाकर प्रताप कोल्यारी से कुम्भलगढ़ गये।

कुम्भलगढ़ पहुँचने के बाद प्रताप ने वहीं से अपने सैन्य संगठन को फिर से सुदृढ़ करना आरम्भ किया। उन्होंने अपनी सैनिक नीति के तहत् गुरिल्ला (छापामार ) युद्ध पद्धति अपनाई। मुगल जो जगह लेते प्रताप मुख्य मुगल सेना के हटते ही उस जगह पर फिर से कब्जा कर लेते। धीरे-धीरे उन्होंने अपना सारा प्रदेश फिर से मुगल सेना से छीन लिया और अकबर की महत्त्वाकांक्षा पूरी नहीं होने दी। प्रताप ने फिर से गोगुंदा पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।

अक्टूबर, 1576 में अकबर ने स्वयं ही अजमेर से मेवाड़ पर चढ़ाई आरम्भ की। उसने नवम्बर, 1576 में उदयपुर जीता व उसका नाम मुहम्मदाबाद रखा।

बादशाह अकबर द्वारा शाहबाज खाँ को मेवाड़ पर भेजना


बादशाह ने प्रताप को पकड़ने के लिए शाहबाज खाँ के नेतृत्व में शाही सेना को भेजा

प्रथम बार 15 अक्टूबर, 1577 को शाही सेना को दुर्ग • कुम्भलगढ़ आक्रमण हेतु रवाना किया जो चित्तौड़ के बाद राज्य की राजधानी हो गया था। शाही सेना ने कुम्भलगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया लेकिन वह महाराणा प्रताप को नहीं पकड़ सकी।
द्वितीय बार 15 दिसम्बर, 1578 को एवं तृतीय बार 15 नवम्बर, 1579 को शाहबाज खान महाराणा प्रताप पर अधिकार करने के लिए भेजा गया लेकिन वह असफल ही रहा।

भामाशाह की भेंट


महाराणा प्रताप कुम्भलगढ़ से निकलकर राणपुर (रणकपुर) पहुँचे और वहाँ से मेवाड़ की सीमा पार कर ईडर में निकल गये। वहीं चूलिया ग्राम में भामाशाह ने उन्हें काफी धन भेंट कर उनकी आर्थिक सहायता की। भामाशाह का जन्म 1547 ई. में ओसवाल परिवार में भारमल के यहाँ हुआ था। इन्हें मेवाड़ के उद्धारक के रूप में स्मरण किया जाता है। महाराणा प्रताप ने महासहानी रामा के स्थान पर भामाशाह को अपना प्रधान बनाया था।

दिवेर का युद्ध


महाराणा प्रताप ने मेवाड़ की भूमि को मुक्त कराने का अभियान दिवेर (राजसमंद) से प्रारम्भ किया। दिवेर के शाही थाने का मुख्तार सम्राट अकबर का काका 'सुल्तानखान था। महाराणा प्रता ने उस पर अक्टूबर, 1582 में आक्रमण किया। महाराणा •प्रताप को यश और विजय प्राप्त हुई। दिवर की जीत की ख्याति चारों ओर फैल गई। दिवेर की जीत के बाद महाराणा प्रताप ने चावंड में अपना निवास स्थान बनाया। अकबर ने आमेर के राजा भारमल के छोटे पुत्र जगन्नाथ कछवाहा के नेतृत्व में 5 दिसम्बर, 1584 को एक विशाल सेना बा के विरुद्ध रवाना की। वह भी प्रताप को नहीं पकड़ सका। यह अकबर का प्रताप के विरुद्ध अंतिम अभियान था। 

चावंड को नई राजधानी बनाया


प्रताप ने 1585 में चावंड में मेवाड़ की नयी राजधानी स्थापित की। प्रताप के अंतिम बारह वर्ष और उनके उत्तराधिकारी महाराणा अमरसिंह के राजकाज के प्रारम्भिक 16 वर्ष चावंड में बीते। चावंड 28 साल मेवाड़ की राजधानी रहा। चावंड गाँव से लगभग आधा मील दूर एक पहाड़ी पर प्रताप ने अपने महल बनवाये। 19 जनवरी 1597 को प्रताप का चावंड में देहान्त हुआ। चावंड से कुछ दूर बांडोली गाँव के निकट महाराणा का अग्नि संस्कार हुआ जहाँ उनको छतरी बनी हुई है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य


हल्दीघाटी के युद्ध में हकीम खाँ सूर एवं चित्रकला के क्षेत्र में नसीरुद्दीन (नसीरदी) को महत्त्व प्रदान करना महाराणा प्रताप की धर्मनिरपेक्षता को सिद्ध करते हैं।

कर्नल टॉड ने हल्दीघाटी को 'मेवाड़ की थर्मोपली और दिवेर को 'मेवाड़ का मेराथन' कहा था। अबुल फजल ने हल्दीघाटी के युद्ध को 'खमनौर का युद्ध' तथा बदायूँनी ने 'गोगून्दा का युद्ध' कहा है।

FAQ: (अक्सर पूछे जाने वाला सवाल)


Q:1. महाराणा प्रताप जयन्ती कब है?
Ans: 9 मई को महाराणा प्रताप की जयंती मनाई जाती है
Q:2. हल्दीघाटी का युद्ध कब हुआ था?
Ans:21जून, 1576 (वि.स. 1633) को हल्दीघाटी का प्रसिद्ध युद्ध हुआ।
Q:3. दिवेर का युद्ध कब हुआ था?Ans:अक्टूबर, 1582 को दिवेर का युद्ध हुआ था।
Q:4. Original maharana pratap Photo कैसा है
?

maharana pratap Real photo - original maharana pratap
अंतिम शब्द
अगर आपके मन में इस पोस्ट से जुड़ी कोई सवाल व सुझाव है तो हमे कमेंट जरूर करें. Maharana Pratap history in hindi  महाराणा प्रताप के बारे में  हेल्प मिला हो तो सोशल मीडिया साइटस Twitter, Facebook, WhatsApp, Instagram पर Share जरुर करें आपका धन्यवाद।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ