Who was Rana Sanga History in hindi [2022] राणा सांगा का इतिहास

Who was Rana Sanga History in hindi:- दोस्तो आज हम इस आर्टिकल में ये बतायेंगे की राणा सांगा कौन था राणा सांगा का पूरा इतिहास और राणा सांगा के  बारे में रोचक तथ्य भी बतायेंगे तो आप इस पोस्ट को अंत तक पढ़ना ताकि आपको पूरा समझ आ सके।

Rana sanga

महाराणा संग्रामसिंह मेवाड़ के परम यशस्वी शासक महाराणा कुम्भा के पौत्र तथा महाराणा रायमल के तीसरे पुत्र थे। महाराणा साँगा का जन्म 12 अप्रैल, 1482 को तथा राज्याभिषेक 24 मई, 1509 को हुआ। अजमेर के कर्मचन्द पँवार ने साँगा को उनके बड़े भाइयों से बचाकर अज्ञातवास में रखा था तथा राज्याभिषेक से पूर्व तक वे साँगा के आश्रयदाता बने थे।

संग्राम सिंह के शासन ग्रहण के समय दिल्ली में लोदी वंश के सुल्तान सिकन्दर लोदी, गुजरात में महमूदशाह बेगड़ा और मालवा में नासिर शाह खिलजी का शासन था।

मेवाड़ के पड़ौसी राजपूत राज्यों को पुनः मेवाड़ के प्रभाव में लाने के लिए राणा साँगा ने वैवाहिक संबंध स्थापित किए।

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राणा साँगा और मालवा 

1511 ई. में नासिरुद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद महमूद •खिलजी द्वितीय मालवा की गद्दी पर बैठा किन्तु नासिरुद्दीन के छोटे भाई साहिब खाँ ने महमूद को हटाकर सिंहासन अधिकृत कर लिया। फरवरी, 1518 में सुल्तान महमूद खलजी द्वितीय की सहायतार्थ गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह ने मालवा पर आक्रमण कर माण्डू के दुर्ग को हस्तगत किया। चंदेरी के शासक मेदिनीराय के सहायता हेतु अनुरोध पर राणा साँगा ने मालवा की ओर प्रस्थान किया लेकिन माण्डू के दुर्ग के पतन के समाचार सुनकर

गागरोन दुर्ग पर आक्रमण कर इस दुर्ग को मेदिनीराय के अधिकार में सौंप वे मेवाड़ लौट आए।

मेदिनीराय की शक्ति को समाप्त करने के उद्देश्य से महमूद ने गागरोन पर आक्रमण किया। मेदिनीराय की प्रार्थना पर सांगा पुनः गागरोन पहुँच गए व महमूद से युद्ध किया। इस युद्ध में सांगा को निर्णायक विजय प्राप्त हुई। महमद को बन्दी बना लिया गया। लीकन बाद में राणा ने उसके साथ मानवीय व्यवहार करते हुए उसे क्षमादान देकर मालवा लौटा दिया।

राणा साँगा और गुजरात

इंडर राज्य में हस्तक्षेप : मेवाड़ की गद्दी पर आसीन होने के कुछ वर्षों बाद ही साँगा को इंडर राज्य में अपने समर्थक को गद्दी पर बैठाने का अवसर मिल गया, जिसके लिए उसने इंडर राज्य में हस्तक्षेप किया।

ईडर के राव भाण के पौत्रों-रायमल और भारमल की आपसी • लड़ाई में महाराणा साँगा ने रायमल की सहायता कर उसे ईडर का शासक बनाने में मदद की थी। इस कारण से महाराणा साँगा की गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह से लड़ाई हुई। सुल्तान मुजफ्फरशाह का उत्तराधिकारी सिकन्दरशाह था परन्तु उसका दूसरा पुत्र बहादुरशाह गद्दी पर बैठना चाहता था। अतः वह अपने बड़े भाई से रुष्ट होकर साँगा की शरण में मेवाड़ चला आया। राणा ने उसको सहायता प्रदान कर गुजरात को कई बार लुटवाया और गुजरात की शक्ति को निर्बल किया। 

दिल्ली सल्तनत और साँगा 

खातौली का युद्ध

साँगा के राज्यारोहण के समय दिल्ली का सुल्तान सिकन्दर लोदी था। सिकन्दर लोदी की मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र इब्राहीम लोदी 22 नवम्बर, 1517 को दिल्ली के तख्त पर आसीन हुआ। राणा साँगा ने पूर्वी राजस्थान के उन क्षेत्रों को जो दिल्ली सल्तनत के अधीन थे जीतकर अपने राज्य में मिला लिया था। इससे इब्राहीम लोदी ने क्रुद्ध होकर साँगा को सबक सिखाने के लिए मेवाड़ पर आक्रमण किया एवं दोनों के मध्य 1517 में हाड़ौती • की सीमा पर खातोली का युद्ध हुआ। इस युद्ध में इब्राहीम लोदी की पराजय हुई।

बाड़ी (धौलपुर) का युद्ध 

1519 ई इब्राहीम लोदी ने अपनी पराजय का बदला लेने के लिए मियाँ मक्कन के नेतृत्व में शाही सेना राणा साँगा के विरुद्ध भेजी इस युद्ध में शाही सेना को बाड़ी के युद्ध में बुरी तरह पराजित होकर भागना पड़ा। 

बाबर और साँगा 

राणा साँगा के समय काबुल का शासक बाबर (मोहम्मद जहीरुद्दीन बावर) था जो तैमूर लंग के वंशज उमरशेख मिर्जा का पुत्र था। बाबर ने 20 अप्रैल, 1526 को पानीपत की प्रथम लड़ाई में दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी को परास्त कर दिल्ली पर मुगल शासन की आधारशिला रखी।

दिल्ली पर अधिकार करने के बाद बाबर ने राणा साँगा पर भी अपना अधिकार जमाने हेतु आक्रमण किया। बाबर ने फतेहपुर सीकरी में अपना पड़ाव डाला था। बाबर की ओर से मेहंदी ख्वाजा द्वारा बयाना दुर्ग अधिगृहित कर लिया गया। 

बयाना युद्ध

16 फरवरी, 1527 को साँगा ने बाबर की सेना को हरा बयाना दुर्ग पर कब्जा कर लिया। बाबर ने इस हार का बदला लेने के लिये साँगा पर पुन: आक्रमण हेतु कृच किया। बयाना की विजय के बाद साँगा ने सीकरी जाने का सीधा मार्ग छोड़कर भुसावर होकर सीकरी जाने का मार्ग पकड़ा। वह भुसावर में लगभग एक माह ठहरा रहा। लेकिन इससे बाबर को खानवा के मैदान में उपयुक्त स्थान पर पड़ाव डालने और उचित सैन्य संचालन का समय मिल गया। 

खानवा का युद्ध

17 मार्च, 1527 को खानवा के मैदान में दोनों सेनाओं के मध्य भीषण युद्ध हुआ। खानवा का मैदान आधुनिक भरतपुर जिले की रूपवास तहसील में है।

इस युद्ध में महाराणा साँगा के झंडे के नीचे प्रायः सारे राजपूताने के राजा थे। राणा साँगा ने खानवा के युद्ध से पहले 'पाती पेरवन' की राजपूत परम्परा को पुनर्जीवित करके राजस्थान के प्रत्येक सरदार को अपनी ओर से युद्ध में शामिल होने का निमंत्रण दिया था। मारवाड़ के राव गांगा एवं मालदेव, आमेर का राजा पृथ्वीराज, ईडर का राजा भारमल, वीरमदेव मेड़तिया, वागड़ (डूंगरपुर) का रावल उदयसिंह व खेतसी, देवलिया का रावत बाघसिंह, नरबद हाड़ा, चंदेरी का मेदिनीराय, वीरसिंह देव, बीकानेर के राव जैतसी का पुत्र कुँवर कल्याणमल, झाला अज्जा आदि कई राजपूत राणा साँगा के साथ थे।

साँगा अंतिम हिन्दू राजा थे, जिनके सेनापतित्व में सब राजपूत जातियाँ विदेशियों को भारत से निकालने के लिए सम्मिलित हुई। युद्ध के दौरान राणा साँगा के सिर पर एक तीर लगा जिससे वे मूर्छित हो गये थे। तब झाला अज्जा को सब राज्यचिह्नों के साथ महाराणा के हाथी पर सवार किया। झाला अज्जा ने इस युद्ध संचालन में अपने प्राण दिये। युद्ध में बाबर विजयी हुआ। मूर्छित महाराणा को राजपूत बसवा गाँव (जयपुर राज्य) ले गए।

खानवा के युद्ध में साँगा की पराजय का मुख्य कारण महाराणा साँगा की प्रथम विजय के बाद तुरंत ही युद्ध न करके बाबर को तैयारी करने का समय देना था। राजपूतों की युद्ध तकनीक भी पुरानी थी और वे बाबर की युद्ध की नवीन व्यूह रचना 'तुलुगमा पद्धति से अनभिज्ञ थे। बाबर की सेना के पास तोपें और बंदूकें थी, •जिससे राजपूत सेना की बड़ी हानि हुई थी।

खानवा युद्ध के बाद भारतवर्ष में मुगलों का राज्य स्थायी हो गया तथा बाबर स्थिर रूप से भारतवर्ष का बादशाह बना।

बाद में बाबर राजपूतों पर आक्रमण कर उनकी शक्ति को नष्ट करने के विचार से 19 जनवरी, 1528 को चंदेरी पहुँचा। चंदेरी के मेदिनीराय की सहायता करने तथा बाबर से बदला लेने के लिए साँगा ने चंदेरी की ओर प्रस्थान किया और कालपी से कुछ दूर इरिच गाँव में डेरा डाला जहाँ उसके साथी राजपूतों ने जो नए युद्ध के विरोधी थे, उसको फिर से युद्ध में प्रविष्ट देखकर विष दे दिया। कालपी नामक स्थान पर 30 जनवरी, 1528 को राणा साँगा का स्वर्गवास हो गया। उनको मांडलगढ़ लाया गया जहाँ उनकी समाधि है।

महाराणा साँगा वीर, कृतज्ञ, बुद्धिमान और न्यायप्रिय शासक थे। मेवाड़ के ही नहीं सारे भारतवर्ष के इतिहास में महाराणा संग्रामसिंह (साँगा) का विशिष्ट स्थान है। उनके राजकाल में मेवाड़ अपने गौरव और वैभव के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच गया था। इसलिए उन्हें अंतिम भारतीय हिन्दू सम्राट' के रूप में स्मरण किया जाता है।

महाराणा सांगा की मृत्यु के बाद 5 फरवरी, 1528 के आसपास चित्तौड़ के राज्य का स्वामी राणा रतनसिंह हुए। महाराणा रतनसिंह की सन् 1531 में बूँदी के राजा सूरजमल के साथ आपसी लड़ाई में मृत्यु हो गई। साथ ही सूरजमल भी मारा गया। फिर रतनसिंह के छोटे भाई विक्रमादित्य 1531 ई. में मेवाड़ के राजा बने। उनके समय गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने सन् 1533 में चित्तौड़ पर आक्रमण किया। राणी कर्मवती ने बादशाह हुमायूँ से सहायता मिलने की आशा पर अपना वकील उसके पास भेजा लेकिन उसने सहायता न की। अंतत: कर्मवती ने सुल्तान से संधि की 24 मार्च, 1533 ई. को सुल्तान चित्तौड़ से लौट गया। 1534 ई. में सुल्तान ने फिर आक्रमण किया। महाराणा विक्रमादित्य को तो उदयसिंह सहित बूँदी भेज दिया गया और युद्ध तक देवलिये के रावत बाघसिंह को महाराणा का प्रतिनिधि बनाया गया। रावत बाघसिंह दुर्ग के पाड़नपोल दरवाजे के बाहर तथा राणा सज्जा व सिंहा हनुमानपोल के बाहर लड़ते हुए वीर गति को प्राप्त हुए। सेनापति रूमी खाँ के नेतृत्व में बहादुरशाह की सेना विजय हुई और हाड़ी रानी कर्मवती ने जौहर किया। यह युद्ध चित्तौड़ का दूसरा शाका कहलाता है।

लेकिन बादशाह हुमायूँ ने तुरंत ही बहादुरशाह पर हम कर दिया, जिससे सुल्तान कुछ साथियों सहित मा भा गया। बहादुरशाह के हारने पर मेवाड़ के सरदारों ने पु चित्तौड़ के किले पर अधिकार कर लिया। फिर विक्रमादित पुनः वहाँ के शासक हो गये। 1536 ई. में दासी पुत्र बनक ने एक दिन रात के समय महाराणा को सोते हुए भार डाल और उदयसिंह का भी वध करना चाहा। लेकिन स्वामी पन्नाधाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदयसिंह को बचा लिया। मेवाड़ का स्वामी बनकर बनवीर राज्य करने लगा। उदयसिंह-द्वितीय को लेकर पन्नाधाय कुंभलना पहुँची। वहाँ के किलेदार आशा देवपुरा ने उन्हें अपने पास रखा। 1537 में कुछ सरदारों ने उदयसिंह द्वितीय को मेवाह का स्वामी मानकर कुंभलगढ़ में राज्याभिषेक किया उदयसिंह ने सेना एकत्रित कर कुंभलगढ़ से ही चित्तौड़ प चढ़ाई की। बनवीर मारा गया। 1540 ई. में उदयसिंह अपने पैतृक राज्य के स्वामी बने। 1559 ई. में महाराणा उदयसिंह ने उदयपुर शहर की नींव डाली। इसी सन् में उदयसागर भी बनने लगा, जो 1565 में पूर्ण हुआ। मुगल बादशाह अकबर ने 23 अक्टूबर, 1567 को चित्तौड़ किले पर आक्रमण किया। महाराणा उदयसिंह ने मालवा के पदच्युत शासक राजबहादुर को अपने यहाँ शरण देकर अकबर के लिए चित्तौड़ पर आक्रमण करने का अवसर उपस्थित का दिया। महाराणा उदयसिंह राठौड़ जयमल और रावत पत्ता को सेनाध्यक्ष नियत कर कुछ सरदारों सहित मेवाड़ के पहाड़ों में चले गए। अकबर से युद्ध में जयमल और कल राठौड़ हनुमानपोल व भैरवपोल के बीच और रावत व प रामपोल के भीतर वीरगति को प्राप्त हुए व राजपूत स्त्रियों ने जौहर किया। 25 फरवरी, 1568 को अकबर ने किले पर अधिकार किया। यह चित्तौड़ दुर्ग का तृतीय शाका था। जयमल मेड़तिया और पत्ता सिसोदिया की वीरता पर मु होकर अकबर ने हाथियों पर चढ़ी हुई उनकी पाषाण मूर्तियाँ बनवा कर आगरा के किले के द्वार पर खड़ी करवाई। महाराणा उदयसिंह का 28 फरवरी, 1572 ई. का गोगुन्दा देहान्त हो गया, जहाँ उनकी छतरी बनी हुई है।

FAQ: (अक्सर पूछे जाने वाला सवाल)


Q:1. Rana Sanga height कितनी है?
Ans: 7.1 Feet
Q:2. Rana Sanga son (पुत्र) कौन है?
Ans: उदय सिंह
Q:3. Rana Sanga grandchildren कौन है?

Ans: unknown

Q:4. Rana Sanga Weight कितना है?
Ans: 150KG

Q:5. Rana Sanga Real Photo कैसा है?

Rana sanga real Photo
अंतिम शब्द
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